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पाराशरी ज्योतिष में त्रिकोण भाव की मीमांसा।  


Neeraj Goel
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जन्म कुंडली में उपस्थित बारह भावों की अलग-अलग संज्ञाएँ कही गई हैं। प्रथम भाव अर्थात् लग्न को तनु, द्वितीय भाव की धन, तृतीय भाव की भ्रातृ, चतुर्थ की मित्र, पञ्चम की पुत्र, षष्ठ की शत्रु, सप्तम की स्त्री, अष्टम की मृत्यु, नवम की धर्म, दशम की कर्म, एकादश की आय और बारहवें भाव कि व्यय संज्ञा होती है -

' तन्वर्थसहजबान्धवपुत्रारिस्त्रीविनाशपुण्यानि।
कर्मायव्ययभावा लग्नाद्या भावतश्चिन्त्या:।।'

इन लग्नादि द्वादश भावों की उनकी प्रकृति के अनुसार चतुरस्र,कण्टक, केन्द्र,पणफर,आपोक्लिम, उपचय, अनुपचय, त्रिकोण आदि विशिष्ट संज्ञाएँ भी उपलब्ध होती हैं। लग्नादि द्वादश भावों में से पञ्चम तथा नवम भाव को त्रिकोण कहा गया है-

'धर्मसुतयोस्त्रिकोणं...'। जबकि वशिष्ठ संहिता ग्रन्थ में पञ्चम तथा नवम भाव के साथ साथ लग्न भाव को भी त्रिकोण भावों में परिगणित किया गया है।

त्रिकोण भावों के लिए प्रयुक्त संज्ञाएँ

ज्योतिष शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में प्रत्येक भाव के लिए अनेक संख्याओं का प्रयोग किया जाता रहा है इस क्रम में लग्न पंचम और नवम भाव के लिए भी अनेक संख्याएं प्रयुक्त हुई हैं।
* लग्न भाव - देह, मूर्ति, अङ्ग, तनु, उदय, कल्प, आद्य आदि संज्ञाओं का प्रयोग लग्न भाव के लिए हुआ है - 'लग्नं मूर्त्तिस्तथाङ्गं तनुरुदयवपु: कल्पमाद्यं...'
* पञ्चम भाव - तनय, बुद्धि, विद्या, आत्मज, वाक्, पञ्चम और तनुज संज्ञाओं का प्रयोग पञ्चम या सुत भाव के लिए किया जाता है - '...तनयं बुद्धिविद्यात्मजाख्यम्। वाक्स्थानं पञ्चमं स्यातनुजमथ...'
* नवम भाव - ' गुर्वाख्यं धर्मसंज्ञं नवममिह शुभं स्यात्तपोमार्गसञ्ज्ञम् ' अर्थात् नवम भाव के लिए गुरु, धर्म,शुभ,तप और मार्ग संज्ञा का उल्लेख ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

त्रिकोण भावों के कारक ग्रह

महर्षि पराशर ने अपनी रचना बृहत्पाराशरहोराशास्त्र में लग्नादि द्वादश भावों के लिए विशिष्ट कारक ग्रहों की व्यवस्था दी है। इसी व्यवस्था के अंतर्गत त्रिकोण भाव अर्थात लग्न भाव, पञ्चम भाव तथा नवम भाव के कारक ग्रह अधोलिखित हैं-
* लग्न भाव - सूर्य
* पञ्चम भाव - बृहस्पति
* नवम भाव - बृहस्पति

त्रिकोण भावों की संख्या वस्तुतः कितनी ?

जन्मकुंडली के द्वादश भावों की उनकी समान प्रकृति व प्रवृत्ति के आधार पर विशिष्ट संज्ञा देने की प्रवृत्ति ज्योतिषशास्त्रीय आचार्यों में प्राप्त होती है। जहां कुछ विद्वान त्रिकोण भाव में केवल पञ्चम तथा नवम भाव को स्वीकार करते हैं। वहीं कुछ विद्वान पञ्चम और नवम के साथ-साथ लग्न भाव को भी त्रिकोण संज्ञा से अभिहित करते हैं। यहां यह अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि लघुपाराशरी ग्रन्थ में वर्णित त्रिकोण शब्द से महर्षि पराशर को कौन-कौन से भाव अभिप्रेत हैं यह स्पष्ट हो। अत: निम्नलिखित बिन्दुओं के आलोक में द्वारा उपरोक्त शंका का समाधान प्राप्त हो सकता है-
* सर्वप्रथम तो त्रिकोण शब्द में ही उपलब्ध ' त्रि ' शब्द ही इस दिशा की ओर इंगित करता है कि त्रिकोण भावों की संख्या 'त्रि' अर्थात तीन ही है और ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों में से कुछ ने लग्न को भी त्रिकोण भाव में परिगणित कर इसे पञ्चम और नवम भाव के साथ सम्मिलित कर लिया है तो त्रिकोण भावों में की संख्या तीन होने का मत पुष्ट होता है।
* स्वयं लघुपाराशरी ग्रन्थ में भी कई अन्तःसाक्ष्य प्राप्त होते हैं जो त्रिकोण भावों की संख्या दो से अधिक होने की ओर संकेत करते हैं। इस सन्दर्भ में इस ग्रंथ का श्लोक क्रमांक ६ द्रष्टव्य है - ' सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहा: ...' जिसमें त्रिकोण के स्वामियों के लिए द्विवचनान्त 'नेतारौ' शब्द के स्थान पर बहुवचनान्त 'नेतार:' शब्द का प्रयोग हुआ है।
* राजयोग वर्णन क्रम में लघु पाराशरी ग्रन्थ में प्राप्त यह श्लोक भी उपरोक्त संबंध में विचारणीय है-

' कर्मलग्नाधिनेतारावन्योन्याश्रयसंस्थितौ।
राजयोगाविति प्रोक्तं विख्यातो विजयी भवेत्।।'

अर्थात् दशमेश और लग्नेश यदि परस्पर स्थान-परिवर्तन कर स्थित हों तो राजयोग का निर्माण होता है और यह जातक को विख्यात और विजयी बनाता है। यहां ध्यातव्य है कि यदि लग्न को केवल केन्द्र स्थान माना जाए तो फिर उपरोक्त श्लोक निरर्थक हो जाएगा। क्योंकि लग्नेश अर्थात् केन्द्रेश और दशमेश अर्थात एक और केन्द्रेश के मध्य का स्थान परिवर्तन संबंध राजयोग का निर्माण करने में समर्थ नहीं हो सकता। उपरोक्त श्लोक के अर्थ की उचित संगति तभी बैठ सकती है जब हम लग्न को त्रिकोण स्थान मानें। तब लग्न अर्थात् त्रिकोण स्थान और दशम अर्थात केन्द्र स्थान के स्वामियों के मध्य का स्थान परिवर्तन संबंध राजयोग का निर्माण करेगा और यही सिद्धान्त महर्षि पराशर को भी अभीष्ट है-

' केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम्।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारकौ।।'

अत: उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित हो जाता है कि त्रिकोण स्थानों की संख्या तीन ही है और त्रिकोण शब्द लग्न भाव, पञ्चम भाव और नवम भाव का वाचक है।

मेषादि द्वादश लग्नों में त्रिकोणाधिपति

मेष वृष आदि द्वादश राशियों के आधार पर द्वादश लग्न भी होते हैं। बारह अलग-अलग लग्नों में लग्नेश पञ्चमेश और नवमेश भी भिन्न-भिन्न होते हैं। निम्नलिखित सूची द्वारा मेषादि द्वादश लग्नों के त्रिकोणेशों को स्पष्ट किया जा सकता है -
* मेष लग्न - मेष लग्न के लग्न भाव, पञ्चम भाव और नवम भाव में क्रमशः मेष राशि, सिंह राशि तथा धनु राशि होती है, अतः लग्न भाव में स्थित मेष राशि का स्वामी मंगल, पञ्चम भाव में स्थित सिंह राशि का स्वामी सूर्य तथा नवम भाव में स्थित धनु राशि का स्वामी बृहस्पति मेष लग्न में त्रिकोणेश होंगे। अतः मेष लग्न में मंगल, सूर्य और बृहस्पति त्रिकोणाधिपति होते हैं।
* वृष लग्न - इसी तरह वृष लग्न में शुक्र, बुध और शनि त्रिकोणेश होंगे।
* मिथुन लग्न - मिथुन लग्न में बुध, शुक्र और शनि त्रिकोणेश होते हैं।
* कर्क लग्न - चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति कर्क लग्न में त्रिकोण स्थानों के अधिपति होते हैं।
* सिंह लग्न - सिंह लग्न की कुंडली के लग्न भाव में सिंह राशि, पञ्चम भाव में धनु राशि तथा नवम भाव में मेष राशि होती है। अतः इस लग्न में सिंह राशि का स्वामी सूर्य, धनु राशि का स्वामी बृहस्पति तथा मेष राशि का स्वामी मंगल क्रमशः त्रिकोण स्थान के स्वामी होंगे।
* कन्या लग्न - इस लग्न में बुध, शनि और शुक्र त्रिकोणेश होते हैं।
* तुला लग्न - तुला लग्न के त्रिकोणेश शुक्र, शनि तथा बुध होंगे।
* वृश्चिक लग्न - मंगल, बृहस्पति और चंद्रमा इस लग्न में त्रिकोण स्थान के स्वामी होते हैं।
* धनु लग्न - धनु लग्न की कुंडली के लग्न भाव में धनु राशि, पञ्चम भाव में मेष राशि तथा नवम भाव में सिंह राशि होती है अतः बृहस्पति, मंगल और सूर्य इस लग्न में त्रिकोणेश होते हैं।
* मकर लग्न - शनि, शुक्र और बुध इस लग्न में त्रिकोणाधिपति होते हैं।
* कुंभ लग्न - कुंभ, मिथुन और तुला राशि इस लग्न के जन्माङ्ग में लग्न, पंचम और नवम भाव में स्थित होते हैं। अतः त्रिकोणेश शनि बुध और शुक्र होंगे।
* मीन लग्न - मीन लग्न की कुंडली के लग्न, पञ्चम और नवम भाव में क्रमशः मीन, कर्क और वृश्चिक राशियाँ विद्यमान होती हैं, अतः इस लग्न में त्रिकोणेश गुरु, चंद्रमा और मंगल होते हैं।

त्रिकोणेशों का शुभत्व

त्रिकोणेशों का शुभत्व प्रतिपादित करते हुए महर्षि पराशर कहते हैं - ' सर्वे त्रिकोणनेतारो ग्रहा: शुभफलप्रदा:।' अर्थात् त्रिकोण स्थानों के अधिपति होने के उपरान्त सूर्यादि सभी ग्रह जातक को शुभ फल देने वाले होते हैं। ज्योतिषशास्त्र की फलित शाखा में सामान्यतया नवग्रहों को शुभ और पाप दो वर्गों में विभाजित किया गया है -

'गुरुबुधशुक्रा: सौम्या: सौरिकुजार्स्तु निगदिता: पापा:।
शशिजोऽशुभसंयुक्त: क्षीणश्च निशाकर: पाप:।।'

अर्थात् गुरु, बुध और शुक्र सौम्य या शुभ ग्रह हैं जबकि शनि, मंगल और सूर्य पाप या क्रूर ग्रह हैं। पाप ग्रहों से युक्त बुध पापी ग्रह माना जाता है, जबकि क्षीण चंद्र भी पाप ग्रह की ही श्रेणी में आते हैं। पूर्ण चंद्र को शुभ ग्रह माना गया है। ज्योतिषशास्त्र के उपरोक्त सामान्य सिद्धान्त के अनुसार शुभ ग्रह नैसर्गिक रूप से शुभ फल देने वाले होते हैं, जबकि पाप ग्रह नैसर्गिक रूप से जातक को पाप फल प्रदान करते हैं। महर्षि पराशर प्रणीत लघुपाराशरी ग्रन्थ इस दृष्टिकोण से नितांत भिन्न है। ज्योतिषशास्त्र के उपरोक्त परिपाटी से पूर्णतया अलग सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए महर्षि का कथन है कि कोई भी ग्रह चाहे वह नैसर्गिक शुभ ग्रह हो अथवा पाप ग्रह यदि वह कुंडली के त्रिकोण भाव अर्थात् लग्न, पञ्चम और नवम भाव में से किसी का भी अधिपति है तो वह जातक को केवल शुभ फल ही प्रदान करेगा। यहां जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि हम शुभ किसे कहें तो इसकी सामान्य परिभाषा है- 'मनोऽनुकूलं शुभम् '

महर्षि ने अपने सिद्धांत को और अधिक पुष्ट करने के लिए श्लोक क्रमांक 12 में भी इस विचार की ओर संकेत किया है। कर्क लग्न की कुंडली का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा है-

'कुजस्य कर्मनेतृत्त्वे प्रयुक्ता शुभकारिता।
त्रिकोणस्यापि नेतृत्त्वे न कर्मेशत्त्वमात्रत:।।'

इस उदाहरण में महर्षि ने मंगल के शुभकारी होने का विधान किया है। कर्क लग्न की इस कुंडली में मंगल पञ्चमेश और दशमेश दोनों हैं, अतः जिज्ञासुओं के मन में एक सहज शंका उत्पन्न हो सकती है कि मंगल के शुभ होने का कारण क्या है ? तो इस शंका का निवारण महर्षि ने ही प्रस्तुत किया है, और कहा है कि मंगल की शुभकारिता का कारण उसका त्रिकोणाधिपति होना है न कि उसका केन्द्रेश होना। इसी सिद्धांत के समर्थन में ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों में एक अन्य उक्ति प्राप्त होती है -

"लग्नमारोग्यमाख्यातं तस्मात्तदधिप: शुभ:।
नवमो भाग्यभावोऽस्ति बुद्धिभावश्च पंचम:।
तस्माद् तदाधिपत्येन ग्रहा: सर्वे शुभप्रदा:।।"

त्रिकोणेशों की शुभकारिता का अपवाद

महर्षि पाराशर ने त्रिकोण स्थान के स्वामियों के शुभत्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार तो किया है। परंतु साथ ही साथ उन्होंने कुछ ऐसी परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है, जहां ये त्रिकोणेश शुभ फल के स्थान पर पाप फल देने वाले हो जाते हैं अथवा शुभ फल के साथ-साथ जातक को पाप फल भी प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में महर्षि पराशर के उक्ति है - 'पतयस्त्रिषडायानां यदि पापफलप्रदा:'

अभिप्राय यह है कि त्रिकोण स्थानों के स्वामी यदि त्रिषडायेश भी हों अर्थात् तृतीय भाव,षष्ठ भाव या एकादश भाव के भी अधिपति हों तो ये त्रिकोणेश ही जातक को पाप फल प्रदान करते हैं। इसी श्लोक का अर्थ करते हुए अन्य टीकाकारों का मत है कि यदि त्रिकोणेश त्रिषडायेश भी हो जाएं तो त्रिकोणाधिपति शुभ फल देने के साथ-साथ जातक को पाप फल भी प्रदान करते हैं। इस सिद्धान्त पर अगर हम गंभीरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जो कोई भी ग्रह त्रिकोणेश होगा वह किसी भी परिस्थिति में तृतीयेश या एकादशेश नहीं हो सकता है। त्रिकोणेशों के केवल षष्ठेश होने की संभावना होती है और ऐसी परिस्थिति केवल कर्क, कन्या एवं मकर लग्न में ही संभव हो पाती है। कर्क लग्न में गुरु, कन्या लग्न में शनि एवं मकर लग्न में बुध त्रिकोणेश होने के साथ-साथ षष्ठेश होते हैं। अत: यह कहना अधिक उचित होगा कि यदि त्रिकोणेश, षष्ठेश हो तो वह पापफलद हो जाएगा अथवा शुभ फल देने के साथ-साथ कुछ अशुभ प्रभाव से युक्त फल भी जातक को प्रदान करेगा।

राजयोगों के निर्माण में त्रिकोणेशों की भूमिका

लघुपाराशरी ग्रंथ में वर्णित राजयोगाध्याय में जितने भी राजयोगों का वर्णन है उसमें त्रिकोणेशों की भूमिका सर्वाधिक प्रमुख सिद्ध होती है। राजयोग उत्पन्न करने वाले इन ग्रह योगों पर दृष्टिपात करने से उपरोक्त सिद्धान्त और अधिक स्पष्ट हो जाएगा-
* केन्द्र भाव के अधिपतियों और त्रिकोण भाव के अधिपतियों के मध्य का संबंध विशेष रूप से राजयोग कारक होता है।
* केन्द्र भाव के अधिपति और त्रिकोण भाव के अधिपति यदि दोष युक्त हों तथापि उनके मध्य का संबंध राजयोग देने वाला होता है।
* दशम भाव का अधिपति और तृतीय त्रिकोण अर्थात् नवम भाव का स्वामी यदि व्यत्ययपूर्वक स्थित हों, एक साथ ही स्थित होकर नवम या फिर दशम भाव में स्थित हों या एक साथ होकर अन्य स्थान पर स्थित हों और अन्य देख रहा हो, तब भी जातक को राजयोग की प्राप्ति होती है।
* त्रिकोण स्थान के अधिपतियों के मध्य का कोई भी संबंध (चतुर्विध) राजयोग कारक होता है ।
* त्रिकोणेशों का संबंध यदि सर्वाधिक बली केंद्रेश अर्थात् दशमेश से हो जाए तब भी जातक को राजयोग की प्राप्ति होती है ‌।
* यदि कोई ग्रह त्रिकोणेश और केंद्रेश दोनों हो तो वह भी जातक को राजयोग का फल देता है।
* कर्म स्थान के स्वामी और लग्न स्थान अर्थात् त्रिकोण स्थान के स्वामी यदि व्यत्ययपूर्वक स्थित हों तब भी राजयोग बनता है।
* नवम भाव का अधिपति और दशम भाव का अधिपति अर्थात् प्रथम और तृतीय त्रिकोणेश व्यत्ययपूर्वक स्थित हों तब भी जातक राज्य सुख का भागी होता है।

त्रिकोणाधिपतियों का बलाबल निर्णय

मेषादि द्वादश लग्नों में से प्रत्येक में तीन-तीन की संख्या में त्रिकोणेश होते हैं- लग्नेश, पञ्चमेश और नवमेश। जातकशास्त्र के जिज्ञासुओं के मन में एक शंका उत्पन्न होती है कि इन तीनों त्रिकोणेशों में से कौन सर्वाधिक बली है और कौन कम बली है। यह तो स्पष्ट है कि तीनों ही त्रिकोणेश शुभ फल देने वाले होते हैं। परन्तु सर्वाधिक शुभ फल कौन त्रिकोणेश देगा और अपेक्षाकृत कम शुभ फल किस त्रिकोणेश से प्राप्त होगा, इसका निर्धारण भी आवश्यक है। इस समस्या का समाधान करते हुए महर्षि पराशर की उक्ति है - ' प्रबलाश्चोत्तरोत्तरम् '

अभिप्राय है कि प्रथम त्रिकोण अर्थात् लग्न भाव का अधिपति सबसे कम बलवान होता है, उससे अधिक बलवान पञ्चम भाव का अधिपति होता है जबकि सर्वाधिक बली त्रिकोणेश नवम भाव का अधिपति होगा।

त्रिकोणेशों के शुभत्व की अतिशयता

लघुपाराशरी ग्रंथ में त्रिकोणेशों के शुभत्व की अतिशयता का दिग्दर्शन अष्टमेश के फलादेश के संदर्भ में उपलब्ध होता है। महर्षि पराशर के मतानुसार भाग्य स्थान से व्यय स्थान का अधिपति होने के कारण रन्ध्रेश अर्थात् अष्टमेश शुभ फल देने वाला नहीं होता-

' भाग्यव्ययाधिपत्येन रन्ध्रेशो न शुभप्रद: '

परन्तु वही अष्टमेश जब लग्नेश हो जाता है, अर्थात् अष्टमेश लग्नरूपी त्रिकोणेश भी हो जाता है तो उसके पाप फल देने की प्रवृत्ति पूर्णतया परिवर्तित हो जाती है और वही अष्टमेश जातक को शुभ फल देने वाला हो जाता है।

' स एव शुभसंधाता लग्नाधीशोऽपि चेत् स्वयम् '।।


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