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विदेश यात्रा के योग Yoga of foreign travel


Neeraj Goel
(@neeraj-goel)
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आज के इस युग में हर एक व्यक्ति विदेश में जाकर बसना चाहता है। विदेश यात्रा करना हर एक व्यक्ति का सुनहरा सपना होता है।कोई अपनी आजीविका के लिए तो कोई घूमने फिरने के लिए या तो कोई मौज मस्ती करने के लिए विदेश जाना चाहता है। पहले के समय में विदेश यात्रा करना एक पाप माना जाता था और वही आज के समय में विदेश जाना एक सपना बन गया है।

ज्योतिष में विदेश यात्रा का विचार कुंडली के तृतीय भाव, सप्तम भाव, नवम भाव एवं बारहवें भाव से किया जाता है।

विदेश में अभ्यास का विचार कुंडली के तीसरे और नवम भाव से किया जाता है। कुंडली के तीसरे भाव से छोटी यात्राओं का विचार किया जाता है। छोटी यात्रा यानी की देश में ही की जाने वाली यात्राओं का विचार कुंडली के तीसरे भाव से किया जाता है।कुंडली के नवम भाव से लंबी यात्राओं का और खास करके दरिया पार की विदेश यात्राओं का विचार कुंडली के नवम का जिसको भाग्य भाव से भी जाना जाता है उससे किया जाता है।

डॉक्टर बी.वी रामन जैसे ज्योतिषी विदेश यात्रा के लिए दशम भाव को महत्व देते हैं।

महर्षि पाराशर अपने बृहत पाराशर होरा शास्त्र में यात्रा संबंधी मामलों का विचार कुंडली के सप्तम भाव से करते हैं।

कालिदास की उत्तरकाला मृत में छोटी यात्रा के लिए उसी तरह से तीसरे भाव को महत्व दिया गया है।

कुंडली के चतुर्थ भाव एवं नवम भाव से विदेश यात्रा का विचार किया जाता है।

जातक पारिजातक तथा सारावली के लेखक सप्तम भाव से विदेश यात्रा का विचार करते हैं।

उपर्युक्त बताई गई हुई सभी बातों को ध्यान में रखते हुए आखिरकार यह निष्कर्ष निकलता है कि कुंडली में विदेश यात्रा योग को देखने के लिए कुंडली के तीसरे भाव, सप्तम भाव ,नवम भाव एवं बारहवें भाव का अभ्यास करना अति आवश्यक है कुंडली के यही चारों भाव कुंडली के विदेश यात्रा के योग को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

कुंडली के तीसरे भाव से छोटी यात्राओं का विचार कुंडली के सप्तम भाव से धंधा रोजगार के लिए की जाने वाली यात्राओं का विचार किया जाता है।

कुंडली का चतुर्थ भाव से विदेश यात्रा को अप्रत्यक्ष तरीके से योगदान देता है। अगर जातक की कुंडली में चतुर्थ भाव शुभ ग्रहों से युक्त होगा या तो चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित होगा, कुंडली का चतुर्थ भाव का स्वामी चतुर्थी केंद्र त्रिकोण में स्थित होगा तो ऐसा जातक अपनी मातृभूमि से बहुत ज्यादा प्रेम करता है और मातृभूमि को कभी भी नहीं छोड़ता इसलिए एसा जातक जिसकी कुंडली का चतुर्थ भाव बलवान हो वह कभी भी विदेश यात्रा नहीं कर पाएगा इसलिए विदेश यात्रा के लिए कुंडली के चतुर्थ भाव का अशुभ होना अति आवश्यक है। जिस जातक का चतुर्थ भाव निर्बल होगा या तो चतुर्थेश कुंडली के अशुभ भावों में स्थित होगा वही जातक विदेश यात्रा कर पाएगा।

इसके अलावा ज्योतिष की दृष्टि से विदेश यात्राओं का विचार राशि संख्या अनुसार और राशि तत्वों के स्वभाव के अनुसार भी किया जाता है।

मेष राशि, कर्क राशि, मकर राशि, तुला राशि जैसी चर राशि वाले जातक हमेशा प्रवृत्ति में रहने वाले, घूमने फिरने के शौकीन, महत्वाकांक्षी स्फूर्तिले, चंचल स्वभाव वाले और अथाह शक्ति वाले होते हैं।

जातक की कुंडली में यह चारों राशियां कुंडली के तीसरे भाव में, सप्तम भाव में, नवम भाव में या और व्यय भाव में स्थित हो तो और जातक की कुंडली के ज्यादातर ग्रह चर राशि में हो तो जातक चंचल हमेशा प्रयास करने के लिए तत्पर और जातक को घूमने फिरने में यानी की यात्रा करने में विशेष आनंद आता है ऐसे जातक प्रवास व्यवसाय के साथ जुड़कर अपना काम करते हैं और विदेश यात्रा करते हैं।

कर्क राशि, वृश्चिक राशि और मीन राशि जल तत्व की राशियां है किसी भी यात्रा का विचार करने के लिए और उसने भी विदेश यात्रा का विचार करने के लिए दरिया पार जाना होता है इसलिए विदेश यात्रा के लिए जल तत्व की राशियों का भी बहुत बड़ा महत्व माना गया है।

अगर कुंडली के तीसरे भाव में ,सप्तम भाव में नवम भाव में और बारहवें भाव में जल तत्व की राशियां हो और कुंडली के ज्यादातर ग्रह जल तत्व की राशियों में स्थित हो तो जातक दरियाई यात्रा करके विदेश यात्रा करता है।

उसी तरह से वायु तत्व की राशियां दरियाई और हवाई यात्रा के लिए महत्व की मानी जाती है।कर्क राशि जल तत्व की राशि और तुला राशि वायु तत्व की राशि है उसी तरह से कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा और तुला राशि का स्वामी शुक्र इन दोनों ग्रहों का अगर द्वादश भाव में साथ में स्थित होना हो गया या तो इनकी युति उसी भाव में हो गई तो जातक को विदेश यात्रा करने का मौका मिलता है।

शनि ग्रह को व्यवसाय का कारक माना गया है अगर कुंडली में राहु और शनि दोनों साथ में बैठ गए या तो इन दोनों की युति द्वादश भाव में हो या इन दोनों का संबंध द्वादश भाव के साथ प्रस्थापित हो जाए तो जातक की कुंडली में विदेश यात्रा का योग बनता है।

जातक की कुंडली में यदि भाग्य स्थान का स्वामी द्वादश स्थान में और द्वादश स्थान का स्वामी भाग्य स्थान में हो और इन दोनों का परिवर्तन योग बन रहा हो तो जातक भाग्येश व्ययेश के संबंधों के कारण विदेश से धन की प्राप्ति करता है और इस तरह से वह विदेश यात्रा का योग बनाता है।

लग्नेश का संबंध द्वादश भाव के स्वामी के साथ या तो लग्नेश और द्वादश भाव के स्वामी का परिवर्तन योग हो रहा हो तो जातक विदेश में जाकर बस जाता है।

चर राशि का लग्न और चर राशि के ग्रहों की संपूर्ण दृष्टि लग्न पर हो तो अवश्य ही विदेश यात्रा होती है।

विदेश यात्रा के लिए व्यय भाव के स्वामी तथा विदेश प्रवास को सूचित करने वाले सप्तमेश का संबंध शुक्र के साथ हो तो जातक आनंद और प्रमोद के लिए विदेश यात्रा करता है।

कुंडली में भाग्य स्थान में या तो व्यय स्थान में शनि , राहु, केतु जैसे पाप ग्रह विराजमान हो तो विदेश की यात्रा होती है कुंडली के भाग्य स्थान के स्वामी का और व्ययस्थान के स्वामी का संबंध विदेश से धन प्राप्ति का योग बनाते हैं।

जातक की कुंडली में भाग्य स्थान में अगर सूर्य अपनी उच्च राशि यानी की मेष राशि में या फिर कुंडली में गुरु अपनी उच्च राशि यानी की कर्क राशि में हो तो भी जातक विदेश यात्रा करता है।

कुंडली के सप्तम भाव के स्वामी और द्वादश भाव के स्वामी का परस्पर संबंध जातक के लिए विवाह के पश्चात विदेश यात्रा के योग बनाता है।

कुंडली के पंचम भाव और द्वादश भाव के स्वामी का संबंध जातक को शिक्षा के लिए विदेश यात्रा का योग बनाता है।

कुंडली के दशम भाव के स्वामी तथा द्वादश भाव के स्वामी का संबंध जातक के लिए व्यापार, रोजगार और नौकरी के लिए विदेश यात्रा का योग बनाता है।

कुंडली के चतुर्थ भाव के स्वामी तथा भाग्य भाव के स्वामी का संबंध जातक को पिता के रोजगार या व्यापार के लिए विदेश यात्रा करवाता है।

कुंडली के नवम भाव और कुंडली के द्वादश भाव के स्वामी का संबंध जातक को धार्मिक कार्य हेतु विदेश यात्रा करवाता है।

कुंडली में चतुर्थ भाव का कारक ग्रह चंद्रमा अगर कुंडली के द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक को विदेश यात्रा करने का मौका मिलता है।

शनि और चंद्रमा की युति अगर कुंडली के द्वादश भाव में हो रही हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।

जातक की कुंडली में दशम भाव का स्वामी और द्वादश भाव का स्वामी परिवर्तन योग कर रहे हो तो यानी कि दशम भाव का स्वामी कुंडली के द्वादश भाव में विराजमान हो और द्वादश भाव का स्वामी कुंडली के दशम भाव में विराजमान हो तो भी जातक अपने व्यवसाय, रोजगार या तो कर्म हेतु विदेश जाता है और विदेश जाकर धन उपार्जन करता है।

इस तरह से कुंडली के चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, नवम भाव और द्वादश भाव के साथ अन्य भाव के भावेश ग्रहों का संबंधों का विचार कर और इन भावों के कारक ग्रह की स्थिति का विचार करके विदेश यात्रा के योग का विचार किया जाता है।


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